महाशिवरात्रि – अहं रुद्राय धनुरा तनोमि | मैं रुद्र के धनुष को साधती हूं!

“अहं रुद्राय धनुरा तनोमि… मैं रुद्र के धनुष को साधती हूं”! ऋग्वेद का ये ऋचांश पौष की शीतलता से भरी मृतदेहों तक में चैतन्य फूंकने वाला है। प्रथम बार पढ़ा, तो मेरुदंड में झुरझुरी सी उठ आई थी!

अहं रुद्राय धनुरा तनोमि… मैं रुद्र के धनुष को साधती हूं! उस वैभवशाली धनुष की डोरी को खींचती हूं! कहें कि उस डोरी की तन्यता ही बन जाती हूं, जब वे ब्रह्म के विद्रोही का उच्छेद करने के लिए उद्यत होते हैं।

अहं जनाय समदं कृणोम्यहं… यानी कि मैं लोक जनमानस की ओर से युद्धरत रहती हूं!

मैं ही हूं, जो आकाश व पृथ्वी दोनों पर व्याप्त हूं।

उक्त विवरण ऋग्वेद का है, दशम मंडल का एक सौ पच्चीसवां सूक्त, तदनन्तर छठवां श्लोक। देवी की वैसी प्रतिज्ञा से आरंभ हुए शाक्तचिंतन का पौराणिक प्रसार, महाभारत युद्ध के ठीक पूर्व में कृष्ण द्वारा अर्जुन को शक्तिपूजन हेतु दिए गए परामर्श तक फैला हुआ है।

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शाक्तचिंतन के इस प्रसारित क्षेत्र में कई-कई ज्ञात पड़ाव हैं, कई कई विभाजन भी!

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देवी की पौराणिक स्थापना देखें, तो ‘देवी भागवत पुराण’ अपने सम्पूर्ण रूप में उनका गायन कर रहा है। हालांकि ये पुराण, सनातन की अष्टादश पुराणों की परिधि से इतर उप-पुराणों में अभिहित है।

मूल पुराणों की बात करें तो देवी चरित्र का विशद उल्लेख ‘मार्कण्डेय पुराण’ में मिलता है। ‘दुर्गा सप्तशती’ भी वहीं से संकलित है। इसी कारण मार्कण्डेय पुराण को ‘शाक्त संप्रदाय’ का प्रमुख पुराण माना जाता है।

कैसा रहस्यमयी प्रसंग है कि उप-पुराणों में से ही एक ‘हरिवंश पुराण’ के मात्र दो श्लोकों ने भी सनातन के शाक्त संप्रदाय की स्थापना में महती भूमिका को निर्वहन किया है। ये दो श्लोक अध्याय  उनसठ (59) और एक सौ छियासठ (166) से हैं। कभी अवसर बना तो इनपर लिखूंगा, आगे माई की इच्छा!

पुनश्च शाक्तचिंतन की पौराणिकता पर चलें, तो महाभारत को उपेक्षित करना संभव नहीं!

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विराटपर्व के छठवें अध्याय में, अज्ञातवास में ‘कंक’ बने युधिष्ठिर ने ‘देवी-स्तुति’ की है। ठीक इसी स्तुति का प्रतिरूप, श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को युद्धपूर्व दिया गया परामर्श है। इन दोनों उद्धरणों में देवी को कुमारी, काली, कपाली, महाकाली, चंडी और कांतारवासिनी कहा गया है।

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Mahashivratri special
देवी उमा के शिव से विवाह की योजना तब कार्यान्वित हुई

मानव जाति की शक्ति आराधना का इतिहास लगभग इतना ही पुरातन है, जितना कि मानवों का जंगलों में निवास। यों तो वैदिक स्तुतियों में रचनाकार और स्थान का उल्लेख ना के बराबर होता है, किन्तु फिर भी, शक्तिपूजन में “विंध्य पर्वत” उल्लेख सर्व प्राचीन है।

और ये तब की बात है, जब देवी आदिशक्ति अपने कौमार्य स्वरूप में प्रतिष्ठित थीं। मानवों की आराध्या उस कुमारी ने शनै:-शनै: संसार की समस्त संहारक शक्तियों पर अपना आधिपत्य कर लिया, एक ऐसी “कुमारी योद्धा” जिसके योग्य केवल “रुद्र” ही एकमात्र वर थे।

इस प्रकार संसार के दो महानतम योद्धाओं के विवाह का सूत्रपात हुआ और वेदों ने उस देवी को ‘रुद्राणी और भवानी’ संबोधित कर यशगान किया!

हालांकि देवी उमा के शिव से विवाह की योजना तब कार्यान्वित हुई, जब देवासुर संग्राम में असुरों को पराजित करने के पश्चात् देवों का अहंकार बढ़ गया। और इन्द्र सहित तमाम देवों को उपदेश प्रदान करने हेतु देवी उमा का प्रादुर्भाव हुआ। (इस प्रसंग का वैदिक उल्लेख “केनोपनिषद्” के अंतिम खंडों में मिलता है!)

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कालांतर में देवों को उपदेश देने वाली इन्हीं ‘देवी हैमवती उमा’ के सौजन्य से दो महत्त्वपूर्ण कार्य संपादित हुए। अव्वल तो यही कि वे ‘ब्रह्म’ की मायाशक्ति नियुक्त हुईं और दूजा ये कि उनका पाणिग्रहण शिव से हुआ।

और इसी विवाह को असंख्य अनगिनत सदियां बीत चुकी हैं! किन्तु उस वर्षगांठ का पता केवल सनातन सभ्यता के पास है, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी, महाशिवरात्रि! और ये सभ्यता आपको अवसर देती है, आमंत्रण देती है, दो महानतम योद्धाओं रुद्र व देवी के विवाह उत्सव मनाने हेतु!

ताकि फिर कभी मानव जाति संकटों में जा धंसे, तो देवी ढाल बनकर घोषणा करें : “अहं जनाय समदं कृणोम्यहं… यानी कि मैं लोक जनमानस की ओर से युद्धरत रहती हूं!”

ताकि फिर कभी ब्रह्म के प्रति विद्रोह हो, तो सृष्टि में गुंजायमान हो : “अहं रुद्राय धनुरा तनोमि… मैं रुद्र के धनुष को साधती हूं! उस वैभवशाली धनुष की डोरी को खींचती हूं!”

Yogi Anurag

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