Sunday, September 19, 2021
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वट सावित्री व्रत का महत्व | यह क्यों और कब मनाया जाता है

पौराणिक मान्यता के अनुसार सावित्री के अल्पायु पति सत्यवान की मृत्यु के बाद जब यमराज (मृत्यु के देवता)  उसके प्राण लेकर जाने लगे तो सावित्री अपने पति के प्राण पुनः वापस लेने के लिए यमराज के पीछे-पीछे गई थीं

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हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए वट सावित्री व्रत या ज्येष्ठ अमावस्या व्रत को बेहद खास और महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक माना जाता है। वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने अखंड सौभाग्य और पति की लंबी आयु के लिए हर साल ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि के दिन रखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लौटाने के लिए यमराज को भी विवश कर दिया था।

वट सावित्री व्रत इस वर्ष (2021) में हिन्दू पंचांग के अनुसार यह 10 जून दिन वृहस्पति वार को मनाया जाएगा। अमावस्या तिथि का प्रारंभ 09 जून को दोपहर 1 बजकर 57 मिनट से हो चुका है। जो कि 10 जून यानी आज शाम 04 बजकर 22 मिनट तक रहेगी।

उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में, इस दिन विवाहित महिलाएं व्रत रखती हैं और फिर सावित्री-सत्यवान की पौराणिक कथा को सुनते हुये बरगद के पेड़ (जिसे वट वृक्ष के रूप में भी जाना जाता है) की पूजा करती हैं।

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वट सावित्री व्रत को उत्तर भारत के अनेक प्रान्तों जैसे उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, दिल्ली सहित अनेक राज्यों में ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि के दिन मनाया जाता है। जबकि इसके विपरीत ये ही व्रत महाराष्ट्र, गुजरात और अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर के दिन मनाती हैं, जिसे वहाँ वट पूर्णिमा व्रत कहा जाता है।

वट सावित्री व्रत का इतिहास और महत्व:

हिंदू धर्म में बरगद को पूजनीय वृक्ष माना जाता है। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार मान्यता है कि इस वृक्ष में सभी देवी-देवताओं का वास होता है। मुख्यतः इस वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्र भाग में भगवान शिव का वास माना गया है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार सावित्री के अल्पायु पति सत्यवान की मृत्यु के बाद जब यमराज (मृत्यु के देवता)  उसके प्राण लेकर जाने लगे तो सावित्री अपने पति के प्राण पुनः वापस लेने के लिए यमराज के पीछे-पीछे गई थीं। यमराज ने सावित्री का अपने पति के प्रति लगाव देखकर उससे कुछ प्रश्न पुछे, यमराज के द्वारा पूछे गए प्रश्नों का सही उत्तर देकर उसने यम को अपने मृत पति सत्यवान को एक नया जीवन देने के लिए मजबूर किया।

उस समय वट वृक्ष के नीचे ही यमराज ने सत्यावान के प्राण वापस किए थे। इसी दिन से वट सावित्री पूजन की परंपरा पड़ी है। इसीलिए वट सावित्री व्रत पूजा के लिए बरगद का वृक्ष होना बहुत जरूरी है। मान्यता के अनुसार जब सावित्री पति के प्राण पुनः प्राप्ति के लिए यमराज के पीछे गई थी तो उस समय वट वृक्ष ने अपनी जटाओं से सावित्री के पति सत्यवान के मृत शरीर को छिपा लिया था। ताकि जंगली जानवर उनके शरीर को कोई नुकसान न पहुँचा सकें।  इसी लिए इस दिन वट वृक्ष की पूजा की जाती है

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वट सावित्री व्रत की तिथि और समय:

हिंदू चंद्र कैलेंडर के अनुसार भारत में वट सावित्री व्रत दो बार मनाया जाता है – अमावस्या और पुर्णिमा तिथि को।

चंद्र मास हिंदू कैलेंडर की मूल इकाई है, जो चंद्र-सौर आधारित कैलेंडर है। भारत में दो प्रकार के चंद्र मास का प्रयोग किया जाता है। एक प्रकार का चंद्र मास अमावस्या को समाप्त होता है और दूसरे प्रकार का चंद्र मास पूर्णिमा के दिन समाप्त होता है। जबकि उत्तरी राज्य पूर्णिमांत कैलेंडर का पालन करते हैं, दक्षिणी राज्य अमंता के अनुसार दिन को चिह्नित करते हैं, वट सावित्री व्रत मनाया बेशक दो अलग – अलग तिथियों को जाता है लेकिन दोनों दिन ज्येष्ठ के महीने में ही मनाए जाते हैं।

ज्येष्ठ अमावस्या:

इस बार वट सावित्री व्रत या ज्येष्ठ अमावस्या 10 जून 2021 को मनाई जाएगी। इस दिन अमावस्या तिथि (समय) 9 जून को दोपहर 1:57 बजे आरंभ होकर और 10 जून को शाम 4:22 बजे समाप्त होगी। क्योंकि पंचांग के अनुसार सूर्योदय पूर्व की तिथि को माना जाता है इसीलिए व्रत वेयम पूजन 9 जून को नहीं अपितु 10 जून को ही किया जाएगा।

ज्येष्ठ पूर्णिमा:

वहीं भारत के दक्षिणी राज्यों में इस वर्ष, वट पूर्णिमा व्रत 24 जून 2021 को मनाया जाएगा।

वट सावित्री व्रत की पूजा सामग्री:

बांस की लकड़ी से बना पंखा, अक्षत (चावल), हल्दी, देशी घी की बाती, अगरबत्ती या धूपबत्ती, लाल-पीले रंग का कलावा, तांबे के लोटे में स्वच्छ/ताज़ा जल, पूजा के लिए कुमकुम या रोली, फूल एवं मिष्ठान, लाल रंग का वस्त्र पूजा में बिछाने के लिए, पांच प्रकार के फल, बरगद का पेड़ और पकवान आदि।

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वट सावित्री व्रत पूजा विधि:

इस दिन सुहागिन महिलाएं प्रातः जल्दी उठाकर सूर्योदय से पहले स्नान करती हैं, वे स्वयं को एक दुल्हन की तरह तैयार होकर ‘सोलह श्रृंगार’ पहनती हैं। वे उपवास रखकर बरगद के पेड़ की पूजा करने जाती हैं, अगर घर के आस-पास वट वृक्ष नहीं होता या किसी कारण महिला वहाँ तक नहीं जा सकती, तो उसके लिए बरगद की एक टहनी को घर पर ही लाकर, उसे मिट्टी में लगाकर फिर उसकी पूजा की जा सकती है। पूजा के लिए सर्वप्रथम सावित्री और सत्यवान की मूर्तियों को पेड़ के तने के नीचे रखा जाता है उसके बाद महिलाएं पेड़ के चारों ओर पीले और लाल रंग का कलावा  बांधती हैं। हालाँकि, अनुष्ठान और पूजा विधि जगह-जगह भिन्न हो सकती है।

  • सर्वप्रथम सावित्री और सत्यवान की मूर्तियों को पेड़ के तने के नीचे रखें
  • बरगद के नीचे घी का दीपक जलाएं और धूप या अगरबत्ती भी जलाएं
  • वट वृक्ष में जल पुष्प, अक्षत, फूल, मिष्ठान आदि अर्पित करें
  • जल से वटवृक्ष को सींचकर उसके तने के चारों तरफ कलावा बांधते हुये कम से कम 3 बार बरगद के पेड़ की परिक्रमा करें
  • फिर वृक्ष को पंखे से हवा दें
  • हाथ में काले चने लेकर सावित्री – सत्यवान की संपूर्ण कथा सुनें
  • भीगे हुए चनों का बायना निकालकर, उसके साथ भोजन एवं वस्त्र रखकर अपनी सास के पैर छूकर उनको दें और आशीष प्राप्त करें। यदि किसी कारणवश सास वहाँ न हो तो बायना उन तक पहुंचाएं, और अगर सास जीवित ना हो तो किसी ब्राह्मणी वृद्धा को भी दे सकतीं हैं।
  • पूजा करने के बाद चने-गुड़ का प्रसाद बांटे
Dr Anil Verma
Editor in Chief

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